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गुरुवार, 18 मार्च 2010

डी.एम.का जनता दरबार या मजाक?खुद डी.एम.संजय कुमार अग्रवाल ही घुमावदार नज़र आता है!

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के घर-जिले नालंदा में आज एक चौंकाने वाली बात उभरकर सामने आई है. यहाँ पदास्थापित डी.एम. संजय कुमार अग्रवाल जो श्री कुमार के अत्यंत विश्वासपात्र प्रशासनिक आला अधिकारी माने जाते है.उनकी भी सारी गतिविधियाँ महज मीडीया की चौखट तक ही सीमित नज़र आती है और इस सन्दर्भ में विश्लेषक उन्हें “मीडीया मैनेजमेंट” के माहिर अधिकारी बताते है.
वहारहाल, आज नालंदा में डी.एम. श्री अग्रवाल ने “जनता दरबार” लगाई थी.यह दरबार जनसमस्याओं को लेकर कम और स्थानीय अखबारों में सुर्खियाँ पाने को लेकर अधिक चर्चित रहा है.यहाँ सबसे दुर्भाग्यजनक पहलू है कि अखबारों से जुड़े लोगों के लिए भी पत्रकारिता कोई व्यवसाय नहीं अपितु धंधा बन गया है.
कहते हैं कि जिले के हिलसा अनुमंडल के नगरनौसा प्रखंड-अंचल के रामपुर पंचायत अंतर्गत लोदीपुर गांव निवासी एक व्यक्ति ने जनता दरबार में डी.एम. संजय कुमार अग्रवाल से शिकायत करते हुये बताया कि एन.एच.३०(ए) अवस्थित बोधीबिघहा रामघाट से रामपुर पंचायत भवन तक प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क निर्माण योजना के तहत मार्ग-निर्माण में ठेकेदार ने रात्रिकाल में अपनी दवंगता दिखाते हुये उनकी रैयती जमीन के एक हिस्से को गढ्ढा कर दूसरे हिस्से को भर दिया.जबकि सरकारी तौर पर उसे इस सन्दर्भ में कोई आदेश-निर्देश नहीं दिया गया था.जिला प्रशासन के अधिकारिओं ने तब उक्त ठेकेदार की दबंगई को सही करार देते हुये शिकायतकर्ता के कुल १४ डीसमील जमीन पर जबरन कार्य करने की पुष्टि की थी और न्यायोचित कार्रवाई करने का भरोसा दिया था.लेकिन आज जब जनता दरबार में जिले के डी.एम. का लिखित ध्यान इस ओर दिलाया गया तो इस श्रीमानजी का जबाब समूचे शासन व्यवस्था को झकझोर कर रख देता है.शिकायतकर्ता को डी.एम.साहेब का कहना था कि कार्रवाई करना या जमीन का मुआबजा देना सरकार का काम है और वे सरकार नहीं हैं. इसके आगे डी.एम.अग्रवाल साहेब ने जो जबाब दिया उसे सुनने पर किसी का भी माथा ठनक जाएगा. इस साहब का कहना था कि वे अधिक से अधिक शिकायतकर्ता की जमीन वापस कर सकते हैं.
सच पूछिए तो नालंदा के डी.एम.संजय कुमार अग्रवाल ने जिस लहजे में शिकायतकर्ता की समस्या को सुलझाने/टरकाने का प्रयास किया.,उस तरह का अंदाज किसी आईपीएस अधिकारी से उम्मीद नहीं की जा सकती और न हीं शोभा ही देता है.यह तो एक चपरासी को भी मालूम होता है कि एक जिले में डी.एम. का पद तथा उसकी जबाबदेही किस तरह की होती है.

गुरुवार, 4 मार्च 2010

बिहार:गरीबों को टरकाते हैं हिलसा अनुमंडल के पदाधिकारी

कहानी है बिहार के “सुशासन कुमार” के नाम से चर्चित मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के घर-जिले नालंदा के नगरनौसा प्रखंड-अंचल के लोदीपुर गाँव के मजदूर वर्ग के एक फटेहाल परिवार की.इस परिवार का जनवितरण प्रणाली से राशन कार्ड हटा दिया गया है. अति पिछड़ी “कहार” जाति के प्रवेश राम की पत्नी नीचे स्तर से लेकर एसडीओ (अनुमंडल स्तर) तक गुहार लगाकर थक चुकी है. जिले के हिलसा अनुमंडल के एसडीओ ने श्री राम की पत्नी से जो कुछा कहा, वो खुद में हास्यास्पद है और यह दर्शाता है कि नीतीश जी के सुशासन में भी वरीय अधिकारी तक आम गरीव लोगों को किस तरह टरकाते हैं.
पीडिता की शिकायत है कि उसका नाम गरीबी रेखा के नीचे होने के बाबजूद राशन कार्ड लुप्त कर दी गई है.जब नीचले स्तर पर कोई सुनवाई नहीं की गई तो उसने अनुमंडल पदाधिकारी से सीधे मिलकर मौखिक-लिखित शिकायत की.अनुमंडल पदाधिकारी ने कहा उसका व उसके पति-बच्चों के नाम साधारण सूची में(ससुर) के साथ जोड़ दिया गया है.जबकि,दो माह पूर्व उसका नाम गरीबी रेखा के नीचे होने के कारण पास पीला राशन कार्ड सूची में था और जब आंगनबाडी केन्द को सूची-सुधार का कार्य सौंपा गया तो उसके बाद उसका राशन कार्ड क्रम लुप्त कर दिया गया. इस संबंध में जब आंगनबाडी केंद्र संचालिका से संपर्क किया तो उसने बताया कि उसने नाम यथावत छोड़ दिया था लेकिन मुखिया ने अपनी दबंगता दिखाते हुए सूची के उस पेज को ही फाड़ दिया जिसमे पीड़ीता के परिवार का नाम अंकित था.
उल्लेखनीय है कि उक्त पीड़ीत परिवार के पास मात्र एक-डेढ डीसमील भूमि है और वीते वर्ष गरीवी रेखा के नीचे होने के कारण एकल परिवार के तहत उसे इंदिरा आवास तथा परिवार नियोजन व अन्य स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराई गई थी.
वहरहाल,यह समस्या सिर्फ एक गरीब परिवार की नहीं है अपितु अकेले नालंदा जिले के नगरनौसा प्रखंड-अंचल के नाना प्रकार के बुनियादी समस्याओं से ग्रस्त रामपुर पंचायत के सैकड़ों परिवार की है जो नीतीश राज” के कथित सुशासन को मुहँ चिढ़ा रही है.अत्यंत दुर्भाग्यजनक पहलू तो यह है कि स्थानीय विधायक व प्रदेश के मानव संसाधन मंत्री हरिनारायण सिंह पड़ोस के गाँव के ही रहने वाले हैं.फिर भी इस पंचायत की समस्याओं में दिलचस्पी नहीं लेते.शायद इसलिए कि वे जितनी बार चुनाव जीते हैं,उसमें कभी “लालू लहर” बड़ा फैक्टर रहा तो अब “नीतीश-सुशासन” की पतेवार दिमाग में है.

शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

चिराग तले अंधेरा वाली कहावत चरितार्थ है नालंदा जिला में.

एक ओर जहां बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेक कार्यों एवं विकास के प्रति उनके बुलंद इरादों की सर्वत्र प्रसंशा हो रही है,वही उनके घर-जिले नालंदा जिले में शासन व्यवस्था का कुछ और ही मंजर दिखता है.निचले स्तर पर जहाँ भ्रष्टाचार चरम स्तर पर है,शीर्ष स्तर पर सारे अधिकारी व जनप्रतिनिधि निकम्मे.सच पूछिए तो सुशासन के ढींढोरा पिटने वाली “नीतीश-राजतंत्र” में यहाँ दीया तले अन्धेरा वाली कहावत पूर्णतः चरितार्थ है.आश्चर्य की बात यो यह है कि नालंदा जिले के सभी आठ विधानसभा क्षेत्रों में राजग के ही विधायक हैं और सब के सब सिर्फ खाने कमाने में व्यस्त है.सबसे बुरी स्थिति नालंदा जिले के चंडी क्षेत्र की है.यहाँ छोटी-छोटी जन समस्याओं की सुध लेने वाला कोई नहीं है. स्थानीय विधायक हरिनारायण सिंह जो “नीतीश मंत्रिमंडल” में काबीना मंत्री (मानव संसाधन विकास मंत्री” है,उन्हें आम जनता में कम और लूट-खसोंट में कहीं अधिक दिलचस्पी झलकती है. जदयू के ग्लैमर नेता श्री नीतीश कुमार(वर्तमान मुख्यमंत्री) के आशीर्वाद से चुनाव जीतने और मंत्री बनाने के बाद आम जनता के दुःख-दर्द से इन्हें सिर्फ मीडीया तक ही मतलब है.प्रखंड,अंचल,थाना स्तर से लेकर अनुमंडल,जिला स्तर तक के आला अधिकारियों का हाल भी कमोवेश यही है.श्री नीतीश कुमार ने अपनी नालंदा संसदीय सीट का उतराधिकारी जिस युवा नेता कौशलेन्द्र कुमार को चुन सांसद बनवाया है,उससे निकम्मा जनप्रतिनिधि तो जिले के अब तक के इतिहास में नहीं हुआ है.

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2010

अपने घर-जिले नालंदा में फैले कुशासन को लेकर "सुशासन बाबू " ने अपनाये कड़े तेवर

समूचे देश-दुनिया में “सुशासन बाबू” के नाम से चर्चित हो रहे बिहार के मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार ने अंततः एक शिकायतकर्ता की शिकायत को गंभीरता से लिया और अपने घर-जिले में फैले कुशासन को लेकर आला अफसरों की जमकर क्लास ली.इसका असर यह हुआ कि एक मामले पर पिछले तीन सप्ताह से कुंभकर्णी नींद सो रहे अधिकारी अचानक हरकत में आये और २४ घंटे के भीतर समस्या समाधान में जुट गए. अब देखना है कि आगे क्या सकारात्मक कार्रवाई होती है.......

मंगलवार, 26 जनवरी 2010

सुशासन बाबू:अब आपही बताईये कि दोषी कौन?कुशासन या किसान?

वेशक बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बिहार और बिहारियो को गौरर्वान्वित करने के जी-तोड प्रयास व उनके नेकइरादे पर फिलहाल सीधी उंगली नही उठाई जा सकती.खासकर नालन्दा को वे और भी प्रतिष्ठित बनाना चाहते है.इसपर भी तत्काल छींटाकशी करना बेईमानी ही होगी.लेकिन आजकल समुचे देश मे “सुशासन बाबू” के नाम से बहुचर्चित श्री कुमार के घर-जिले मे सर्वत्र जो कुछ नजारा दिख रहा है,वे प्रमाणित करते है कि उनके मातहत शासन-व्यवस्था संभाल रहे शीर्ष अधिकारी लोग भविष्य का बेडागर्क करने का पूरा मन बना लिये है और यही हाल रहा तो निश्चित तौर पर यहाँ के कुशासान का ठीकरा मुख्यमंत्री के सिर पर ही फूटेगा.आखिर “पुनः लौट न आये लालू का भूत” का भय के सहारे वे कब तक सुशासन की नाव खेते रहेगे.
करीव एक सप्ताह पूर्व नालंदा जिले के नगरनौसा अंचल के एन.एच.30ए पर अवस्थित रामघाट बोधीबिगहा से रामपुर गांव तक प्रधानमंत्री ग्रामीण सडक योजना के तहत बनाई जा रही मार्ग के निर्माण के दौरान एक दबंग ठेकेदार द्वारा मनमानी-लूटखसोट करने की शिकायत जिला-प्रशासन के शीर्ष अधिकारियो बी.डी.ओ.से जिलाधिकारी तक से की गई,लेकिन उनके कान मे जूँ तक न रेंगा.यह वगैर राजस्वअधिकारी के स्वीक्रिति के ठेकेदार पटवन,कब्रिस्तान तक को भर ही रहा है,जेसीबी मशीन द्वारा एक अधिकारी की तरह रिश्व्त लेकर कमजोर किसानो की रैयती जमीन पर भी सडक बना रहा है. शिकायत के बाद जहानाबाद का रहनेवाला संबधित ठेकेदार ने अपनी मनमानी और भी बढा दी. इसके बाद सारे मामले की शिकायत फैक्स व ईमेल द्वारा सीधे मुख्यमंत्री से की गई.लेकिन लोगों मे घोर आश्चर्य और निराशा का भाव दिख रहा है क्योंकि उनके स्तर से भी कोई कार्रवाई नही की जा रही है.इस मामले मे आम ग्रामीण “लालूजी” को ही बेहतर बताते है और कहते है कि कम से कम उनका अपने अधिकारियो पर पूर्ण नियंत्रण था और आम ग्रामीणो की शिकायतो को वे गंभीरता से लेते थे.
एक ताजा मिली शिकायत का आंकलन करने पर समझ मे नही आता है कि दोषी कौन है.सुशासन बाबू का कुशासन या किसान? नालन्दा जिले के चंडी थानांतर्गत थरथरी प्रखंड के मकुनन्दबिगहा गांव निवासी एक किसान परिवार की कहानी “अन्धेर नगरी-चौपट राजा” की याद ताजा कर देती है.कहानी चार गरीव किसान भाईयो की है.जो बाढ राहत मुआवजा प्रक्रिया की सही जानकारी न होने के कारण जमीन की एक ही जमाबन्दी रशीद पर अलग-अलग 1800रू.राशि भुगतान पा ली. यह मामला जब प्रकाश मे आया तो प्रखंड विकास पदाधिकारी ने चारो किसान भाईयो के विरूद्ध थाना मे मामला दर्ज करा दिया.अब थाना का एक छोटा बाबू उससे बतौर नजराना प्रति भाई 5000रू. यानि 20000रू. मांग रहा है.जबकि420 का दोषी यदि यदि इन किसान भाईयो को मान लिया भी जाय तो इनलोगो से कही अधिक गुनाहगार पंचायतसेवक, मुखिया, ग्रामसेवक, अंचलनिरीक्षक से लेकर खुद मुकदमा करने वाले प्रखंड विकास पदाधिकारी ही है.क्योंकि किसी भी किसान को आपदा संबन्धी मुआवजा इन सबो के गहन जांच-पडताल के वगैर नही मिलती.भादवि के तहत चंडी थाना मे दर्ज इन लोगों को पाक-साफ रखा गया है. इस प्रकरण का रोचक पहलू है कि पीडित चारो भाईयो मे एक राजकुमार नामक भाई ने सुचनाधिकार के तहत प्रखंड कार्यालय संबधी सूचना पाकर प्रखंड विकास पदाधिकारी के विरूद्ध लाखो रू.के एक बडे कागजी“डीजल घोटाले” का पर्दाफाश किया था.समाचार-पत्रो की सुर्खिया बने इस प्रकरण मे अब तक कोई कार्रवाई नही की गई है,जबकि बदले की कार्रवाई स्वरूप दर्ज मुकदमा मे चारो किसान भाईयो को दबोचने के लिये पुलिस खाक खाक छानती फिर रही है.

शनिवार, 23 जनवरी 2010

ई है बिहार के "सुशासन बाबू" की कैसी "सुशासित नालन्दा नगरिया"!

समूचे देश मे "सुशासन कुमार " के नाम से चर्चित हो रहे बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार के सुशासन का बेडागर्क उनके ही घरजिले के शीर्ष अधिकारी करने पर तुले है! शासन के हर स्तर पर खुद मुख्यमंत्री जितने सजग और गंभीर नजर आते है,उनके मातहत नौकरशाह / अफसरशाह कही अधिक अगंभीर और लापरवाह.संलगन खबर को ध्यान से पढिये.सारी तस्वीर समझ मे आने लगेगी. चूकि मामले की शिकायत सीधे मुख्यमंत्री से भी की गयी है,इसलिये यहाँ यह देखना काफी दिलचस्प होगा कि वाकई सुशासन के नारे व ईरादे के बल बिहार की छवि बदलने के बाद कुशासन पर उनका नज़रिया कितना तीखी है.बहरहाल फैक्स व ई-मेल द्वारा सीधी सूचना देने के बावजूद भी उनके या उनके सचिवालय ने अब तक इस ओर कोई सुध न ली है
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